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संपादकीय शास्त्रीय संगीत के विश्वराग पंडित रविशंकर
नई दिल्लीः हजरत अमीर खुसरो ने जब वीणा के तारों में फेर-बदल कर सितार का रूप दिया होगा तब उन्होंने यह शायद ही सोचा हो कि भविष्य में उनकी यह सृजन परिकल्पना दुनिया भर में अपनी स्वरलहरियों का जादू बिखेर देगी। ऐसा जादू जो लोगों के सिर चढ़कर बोलेगा।  ऐसा मधुर और इतना सुरीला जिसकी झनकार कई-कई दिनों तक दिमाग में तारी रहेगी। सितार के तारों की झनकार मन-मस्तिष्क में किसी आध्यात्मिक ऊर्जा की तरह  समाती है और धमनियों में रक्त-प्रवाह की तरह बहने लगती है।

ताल, राग, छंद, अलाप.... हमारे भीतर से ऐसे गुजरते हैं कि हमारी संवेदनाओं तक को छू आते हैं। जिस किसी ने भी सितार की स्वरलहरियाँ  सुनी हैं वह इससे कभी इनकार नहीं कर सकता। और अगर किसी ने कभी पंडित रविशंकर को सुना हो तो यकीं जानिए वह वक्त उसके अंतस में कैद होकर रह गया होगा जो यदा-कदा याद भी आ जाया करता होगा। बनारस में 7 अप्रैल ,1920  को जन्मे पंडित रविंद्र शंकर चौधरी ऐसी ही यादगार प्रस्तुतियाँ देते रहे थे। घर में गीत-संगीत का माहौल था। बड़े भाई उदयशंकर तब एक स्थापित नर्तक थे और देश-विदेश में प्रस्तुतियां दिया करते थे। इन दौरों में संगीत मंडली के साथ रविशंकर भी बचपन से ही जाया करते थे। आगे चलकर सितार की तरफ इनका रुझान हुआ। लेकिन पंडित रविशंकर महज सितार ही नहीं राग और ताल के भी परम्परानिष्ठ सानी थे।  मैहर घराने के प्रसिद्ध उस्ताद अल्लाउद्दीन खां से उन्होंने शिक्षा-दीक्षा हासिल की।
 
एक साक्षात्कार में मूर्धन्य शास्त्रीय गायक पंडित जसराज कहते हैं कि 'संगीत जीवन का उल्लास है।' 
 
सही मायने में पंडित रविशंकर ने इस उल्लास को जनव्यापी और विश्वव्यापी बनाया। कलकत्ते में कम कीमत पर और कभी तो मुफ्त भी संगीत सभाओं का आयोजन किया करते थे जिनमें हजारों की तादाद में लोग एकत्रित होते थे। आगे चलकर  इन्होंने विदेशों में भी शास्त्रीय संगीत का प्रचार-प्रसार किया। लेकिन यह प्रचार-प्रसार इतना सुगम भी नहीं था। यह एक संस्कृति की परंपरा को दूसरी के साथ जोड़ना था, वह भी परिष्कार व नवोन्मेष के साथ! उनकी इस कोशिश की भारतीय संगीत जगत में काफी भर्त्सना हुई। शास्त्रीय संगीत को दूषित कर देने के आरोप भी उनपर लगे। पर, रविशंकर विचलित नहीं हुए। उन्होंने कई 'बंदिशें' तैयार कीं जिन्होंने न सिर्फ संगीत के विद्यार्थियों प्रशिक्षु गायकों के लिए नए-नए सबक गढ़े बल्कि संगीत के सुरों की बंदिशें भी तोड़ीं। जिससे भारतीय संगीत विश्वव्यापी बन सका। रविशंकर प्रयोगधर्मी कलाकार थे।भारतीय और पाश्चात्य संगीत के मेल से उन्होंने कई तरह के 'फ्यूज़न संगीत' भी तैयार किये। इस तरह उन्होंने भारतीय संगीत परंपरा का विश्वभर में ख्याति ही नहीं दिलवाई बल्कि शास्त्रीय संगीत सभाओं के नए मॉडल ईजाद कर भारतीय संगीतकारों के लिए नए प्रतिमान भी स्थापित किये। अमेरिका के आधुनिकतावादी संगीतकार फिलिप ग्लास कहते हैं-
" मैं बेहिचक और बिना लाग-लपेट के कह सकता हूँ कि आज जिसे विश्व संगीत आंदोलन कहा जा रहा है उसके गॉडफादर, रवि शंकर ही हैं।" 
 
वरिष्ठ पत्रकार एस. कालिदास लिखते हैं -
" पंडित रविशंकर का महज एक सुर छेड़ना किसी रहस्य के खुलने जैसा होता है और पूरी बंदिश सुनना, परम आनंद!"
 जीवन के अंतिम वर्षों तक वे सितार बजाते रहे। बीमार पड़ते रहने और उम्रदराज होने के बावजूद  संगीत सभाओं में सितार बजाते रहे। 
रविशंकर का यह बड़ा अवदान है कि 
उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत की समझ को विश्व विस्तृत आकाश दिया।
श्रोता तैयार किया। 
 
वह कहते थे-"संगीत में जादू तभी संभव होता है जब कोई कलाकार प्यार से सुनाए और श्रोता भी उसी भाव से उसे ग्रहण करे।"
 
इन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न, ग्रैमी पुरस्कार समेत कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान-पुरस्कार मिले।
 कैलिफोर्निया की एक सभा में पंडित रविशंकर अपनी अंतिम प्रस्तुति देते दिखते हैं । चेहरे पर बढ़ आई सफेद दाढ़ी में सितार बजाते बैठे पंडित रविशंकर और उन्हें घेरे बैठे संगी वाद्यवादक ,सब जैसे समय के घेरे में कैद हो गये हों और रविशंकर तो जैसे किसी चित्रकार की कृति हों जिसे हजारों वर्षों में कभी कोई एक ही बना सकता हो। 
 
11 दिसंबर, 2012 को उन्होंने कैलिफोर्निया में अपनी अंतिम साँसें लीं। जाते-जाते वे संगीत परंपरा की ऐसी विरासत छोड़ गये जो हमारे भीतर हमेशा बजती रहेगी, सितार की झनकार बनकर!

      -सविता पांडेय
संपर्क:-savitapan@gmail.com

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