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देश 17 अक्टूबर को घटस्थापना के साथ होगा नवरात्रोत्सव प्रारम्भ

नई दिल्लीः नवरात्रि का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

‘जग में जब-जब तामसी, आसुरी एवं क्रूर लोग प्रबल होकर, सात्त्विक, उदारात्मक एवं धर्मनिष्ठ सज्जनों को छलते हैं, तब देवी धर्मसंस्थापना हेतु पुनः-पुनः अवतार धारण करती हैं । नवरात्रि में देवीतत्त्व अन्य दिनों की तुलना में 1000 गुना अधिक कार्यरत होता है ।

देवीतत्त्व का अत्यधिक लाभ लेने के लिए नवरात्रि की कालावधि में ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’ नामजप अधिकाधिक करना चाहिए ।

नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन बढते क्रम से आदिशक्ति का नया रूप सप्तपाताल से पृथ्वीपर आनेवाली कष्टदायक तरंगों का समूल उच्चाटन अर्थात समूल नाश करता है । नवरात्रि के नौ दिनों में ब्रह्मांड में अनिष्ट शक्तियोंद्वारा प्रक्षेपित कष्टदायक तरंगें एवं आदिशक्ति की मारक चैतन्यमय तरंगों में युद्ध होता है । इस समय ब्रह्मांड का वातावरण तप्त होता है । श्री दुर्गादेवी के शस्त्रों के तेज की ज्वालासमान चमक अतिवेग से सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियोंपर आक्रमण करती है । पूरे वर्ष अर्थात इस नवरात्रि के नौवें दिन से अगले वर्ष की नवरात्रि के प्रथम दिनतक देवी का निर्गुण तारक तत्त्व कार्यरत रहता है । अनेक परिवारों में नवरात्रि का व्रत कुलाचार के रूप में किया जाता है । आश्विन की शुक्ल प्रतिपदा से इस व्रत का प्रारंभ होता है ।

घटस्थापना

अनेक परिवारों में यह व्रत कुलाचार के स्वरूप में किया जाता है । आश्विन की शुक्ल प्रतिपदा से इस व्रत का प्रारंभ होता है । नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना करते हैं । घटस्थापना करना अर्थात नवरात्रि की कालावधि में ब्रह्मांड में कार्यरत शक्तितत्त्व का घट में आवाहन कर उसे कार्यरत करना ।

कार्यरत शक्तितत्त्व के कारण वास्तु में विद्यमान कष्टदायक तरंगें समूल नष्ट हो जाती हैं । कलश में जल, पुष्प, दूर्वा, अक्षत, सुपारी एवं सिक्के डालते हैं ।

घटस्थापना की विधि में देवी का षोडशोपचार पूजन किया जाता है । घटस्थापना की विधि के साथ कुछ विशेष उपचार भी किए जाते हैं । पूजाविधि के आरंभ में आचमन, प्राणायाम, देशकालकथन करते हैं । तदुपरांत व्रत का संकल्प करते हैं । संकल्प के उपरांत श्री महागणपतिपू्जन करते हैं । इस पूजन में महागणपति के प्रतीकस्वरूप नारियल रखते हैं । व्रतविधान में कोई बाधा न आए एवं पूजास्थलपर देवीतत्त्व अधिकाधिक मात्रा में आकृष्ट हो सकें इसलिए यह पूजन किया जाता है । श्री महागणपतिपूजन के उपरांत आसनशुद्धि करते समय भूमिपर जल से त्रिकोण बनाते हैं । तदउपरांत उसपर पीढा रखते हैं । आसनशुद्धि के उपरांत शरीरशुद्धि के लिए षडन्यास किया जाता है तत्पश्चात पूजासामग्री की शुद्धि करते हैं ।

नवरात्रि महोत्सव में कुलाचारानुसार घटस्थापना एवं मालाबंधन करें । खेत की मिट्टी लाकर दो पोर  चौडा चौकोर स्थान बनाकर, उसमें पांच अथवा सात प्रकार के धान बोए जाते हैं । इसमें (पांच अथवा) सप्तधान्य रखें । जौ, गेहूं, तिल, मूंग, चेना, सांवां, चने सप्तधान्य हैं । कुछ स्थानोंपर जौ की अपेक्षा अलसीका, चावल की अपेक्षा सांवां का एवं कंगनी की अपेक्षा चने का उपयोग भी करते हैं । मिट्टी पृथ्वीतत्त्व का प्रतीक है । मिट्टी में सप्तधान के रूप में आप एवं तेज का अंश बोया जाता है । जल, गंध (चंदन का लेप), पुष्प, दूर्वा, अक्षत, सुपारी, पंचपल्लव, पंचरत्न व स्वर्णमुद्रा अथवा सिक्के आदि वस्तुएं मिट्टी अथवा तांबे के कलश में रखी जाती हैं । सप्तधान एवं कलश (वरुण) स्थापना के वैदिक मंत्र यदि न आते हों, तो पुराणोक्त मंत्र का उच्चारण किया जा सकता है । यदि यह भी संभव न हो, तो उन वस्तुओं का नाम लेते हुए ‘समर्पयामि’ बोलते हुए नाममंत्र का विनियोग करें । माला इस प्रकार बांधें कि वह कलश में पहुंच सके ।

घटस्थापना का शास्त्र एवं महत्त्व

‘मिट्टी अथवा तांबे के कलश में पृथ्वीतत्त्वरूपी मिट्टी में सप्तधान के रूप में आप एवं तेज का अंश बोकर, उस बीज से प्रक्षेपित एवं बंद घट में उत्पन्न उष्ण ऊर्जा की सहायता से नाद निर्मिति करनेवाली तरंगों की ओर, अल्पावधि में ब्रह्मांड की तेजतत्त्वात्मक आदिशक्तिरूपी तरंगें आकृष्ट हो पाती हैं । मिट्टी के कलश में पृथ्वी की जडत्वदर्शकता के कारण आकृष्ट तरंगों को जडत्व प्राप्त होता है और उनके दीर्घकालतक उसी स्थानपर स्थित होने में सहायता मिलती है । तांबे के कलश के कारण इन तरंगों का वायुमंडल में वेग से ग्रहण एवं प्रक्षेपण होता है और संपूर्ण वास्तु मर्यादित काल के लिए लाभान्वित होती है । घटस्थापना के कारण शक्तितत्त्व की तेजरूपी रजतरंगें   ब्रह्मांड में कार्यमान होती हैं, जिससे पूजक की सूक्ष्म-देह की शुद्धि होती है ।

देवी की आरती उतारने की उचित पद्धति

देवी की आरती पूजक को अपनी बार्इं ओर से दार्इं ओर घडी के कांटों की दिशा में पूर्णवर्तुलाकार पद्धति से उतारें । आरती के उपरांत देवीमां की एक अथवा नौ की संख्या में परिक्रमा करनी चाहिए ।

इन सभी कृतियों को भावसहित करने से पूजक को देवीतत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।

कवचपठन

कवच मंत्रविद्या का एक कार है । इसमें देवताओंद्वारा हमारे शरीर की रक्षा होने हेतु प्रर्थना होती है । विविध मंत्रों की सहायता से मानवीय देहपर मंत्रकवचों की निर्मिति करना संभव है । ये कवच स्थूल कवच से अधिक शक्तिशाली होते हैं । स्थूल कवच बंदूक की गोली समान स्थूल आयुधों से रक्षा करते हैं तथा सूक्ष्म कवच स्थूल एवं सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियों से रक्षा करते हैं । दुर्गाकवच, लक्ष्मीकवच, महाकालीकवच आदि के पठन का शत्रु तथा अनिष्ट शक्तियों से रक्षण में सहायता मिलती है ।

देवी की आरती करने की उचित पद्धति

देवता की आरती करना देवतापूजन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है । आरती का अर्थ है, देवता के प्रति शरणागत होना और उनका कृपाप्रसाद प्राप्त करने के लिए आर्तभाव से उनका स्तुतिगान करना । मनुष्य के लिए कलियुग में देवता के दर्शन हेतु आरती एक सरल माध्यम है । आरती के माध्यम से अंत:करण से देवता का आवाहन करनेपर देवता पूजक को अपने रूप अथवा प्रकाश के माध्यम से दर्शन देते हैं । इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों एवं संतोंने विभिन्न देवताओं की आरती की रचना की ।

देवी मां की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी आरती करते समय कुछ सूत्रों का ध्यान रखना लाभदायक है । देवी की आरती गाने की उचित पद्धति -‘देवी का तत्त्व, अर्थात शक्तितत्त्व तारकमारक शक्ति का संयोग है । इसलिए आरती के शब्दों को अल्प आघातजन्य, मध्यम वेगसे, आर्त्त धुन में तथा उत्कट भाव से गाना इष्ट होता है । देवीतत्त्व, शक्तितत्त्व का प्रतीक है, इसलिए आरती करते समय शक्तियुक्त तरंगें निर्मिति करनेवाले चर्मवाद्य हलके हाथ से बजाने इष्ट हैं । देवी की आरती पूजक को अपनी बार्इं ओर से दाईं ओर घडी के कांटों की दिशा में पूर्णवर्तुलाकार पद्धति से उतारें ।

आरती के उपरांत देवीमां की एक अथवा नौ की संख्या में परिक्रमा करनी चाहिए । इन सभी कृतियों को भावसहित करने से पूजक को देवीतत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।

 नवरात्रिकी कालावधिमें उपासना करनेके लाभ

१. नवरात्रिकी कालावधिमें व्यष्टि अर्थात व्यक्तिगत स्तरपर व्रतके रूपमें उपासना करनेसे व्यक्तिको २० प्रतिशत लाभ होता है । तथा

२. सामूहिक स्तरपर अर्थात समष्टि स्तरपर उत्सवके रूपमें उपासना करनेसे व्यक्तिको ३० प्रतिशत लाभ होता है ।

३. केवल उपासनाके कृत्यके स्तरपर निपटानेकी दृष्टिसे व्रत करनेसे व्यक्तिको १० प्रतिशत लाभ होता है ।

४. लगन एवं भावसहित उपासना करनेसे ४० प्रतिशत लाभ होता है । नवरात्रिके प्रथम दिन घटकी स्थापना की जाती है । कुछ परिवारोंमें घटस्थापनाके साथ मालाबंधन भी करते हैं ।

नवरात्रिकी कालावधिमें उपवास करनेका महत्त्व

नवरात्रिके नौ दिनोंमें अधिकांश उपासक उपवास करते हैं । किसी कारण नौ दिन उपवास करना संभव न हो, तो प्रथम दिन एवं अष्टमीके दिन उपवास अवश्य करते हैं । उपवास करनेसे व्यक्तिके देहमें रज-तमकी मात्रा घटती है और देहकी सात्त्विकतामें वृद्धि होती है । ऐसा सात्त्विक देह वातावरणमें कार्यरत शक्तितत्त्वको अधिक मात्रामें ग्रहण करनेके लिए सक्षम बनता है ।

नवरात्रिमें प्रत्येक दिन उपासक भोजनमें विविध व्यंजन बनाकर देवीको नैवेद्य अर्पित करते हैं । बंगाल प्रांतमें प्रसादके रूपमें चावल एवं मूंगकी दालकी खिचडीका विशेष महत्त्व है । मीठे व्यंजन भी बनाए जाते हैं । इनमें विभिन्न प्रकारका शिरा, खीर-पूरी इत्यादिका समावेश होता है । महाराष्ट्रमें चनेकी दाल पकाकर उसे पीसकर उसमें गुड मिलाया जाता है । इसे `पूरण' कहते हैं। इस पूरणको भरकर मीठी रोटियां विशेष रूपसे बनाई जाती हैं । चावलके साथ खानेके लिए अरहर अर्थात तुवरकी दाल भी बनाते हैं ।

 नवरात्रिमें देवीको अर्पित नैवेद्यमें पुरणकी मीठी रोटी एवं अरहर अर्थात तुवरकी दालके समावेशका कारण चनेकी दाल एवं गुडका मिश्रण भरकर बनाई गई मीठी रोटी एवं तुवरकी दाल, इन दो व्यंजनोंमें विद्यमान रजोगुणमें ब्रह्मांडमें विद्यमान शक्तिरूपी तेज-तरंगें अल्पावधिमें आकृष्ट करनेकी क्षमता होती है । इससे ये व्यंजन देवीतत्त्वसे संचारित होते हैं । इस नैवेद्यको प्रसादके रूपमें ग्रहण करनेसे व्यक्तिको शक्तिरूपी तेज-तरंगोंका लाभ मिलता है और उसके स्थूल एवं सूक्ष्म देहोंकी शुद्धि होती है ।

श्री दुर्गादेवीतत्त्व आकर्षित करनेवाली सात्त्विक रंगोलियां

विशेषकर मंगलवार एवं शुक्रवारके दिन देवीपूजनसे पूर्व तथा नवरात्रिकी कालावधिमें घर अथवा देवालयोंमें देवीतत्त्व आकृष्ट एवं प्रक्षेपित करनेवाली सात्त्विक रंगोलियां बनाई जाती हैं। आगे श्री दुर्गादेवीतत्त्व आकृष्ट एवं प्रक्षेपित करनेवाली रंगोली दी है । सभी देवियां आदिशक्ति श्री दुर्गादेवीका रूप हैं । इसलिए विशिष्ट देवीकी उपासना करते समय श्री दुर्गादेवीतत्त्वसे संबंधित  रंगोली बना सकते हैं । ऐसी रंगोली बनानेसे वहांका वातावरण देवीतत्त्वसे आवेशित होकर उसका लाभ होता है । इन  रंगोलियोंमें पीला, नीला, गुलाबी जैसा सात्त्विक रंग भरें ।

अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे प्रत्येक देवता के विशिष्ट तत्त्व होते हैं । शक्तितत्त्व आकर्षित करनेके लिए देवीको गुलदाउदी,  रजनीगंधा, कमल इत्यादि फूल चढाते हैं, उसी प्रकार कुछ आकारोंके कारण भी शक्तितत्त्व आकर्षित होनेमें सहायता मिलती है;  इसलिए ऐसे आकारोंसे युक्त रंगोली बनाते हैं

संदर्भ – सनातनका ग्रंथ, ‘ देवीपूजनसे संबंधित कृत्योंका शास्त्र ’, ‘ देवताओंके तत्त्व आकृष्ट एवं प्रक्षेपित करनेवाली सात्त्विक रंगोलियां ’, त्यौहार मनाने की उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’, ‘ शक्तिकी उपासना – खंड २ ’ व्रतों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’, ‘देवीपूजन से संबंधित कृत्यों का शास्त्र‘ एवं अन्य ग्रंथ

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